Saturday, 8 December 2018

विज्ञान एवं प्रौद्यिगिकी


विज्ञान एवं प्रौद्यिगिकी
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भारतीय राष्ट्रीय अन्तरिक्ष अनुसंधान समिति का गठन - 1962 में डॉ. विक्रम भाई साराभाई की अध्यक्षता में. (चीन भारत युद्ध के तीन साल पहले 62 में सबसे पहले स्पेस पर रिसर्च के लिए समिति का गठन किया गया)
ISRO की स्थापना - 15 अगस्त 1969 (चीन - भारत युद्ध 1965 के चार साल बाद इसरो का गठन हुआ)
अन्तरिक्ष आयोग और अन्तरिक्ष विभाग का गठन - 1972
इसरो किस विभाग के अधीन है ? - अन्तरिक्ष विभाग
देश का पहला साउंडिंग राकेट "नाइक एपाश" का प्रक्षेपण - 21 नवम्बर 1963, थुम्बा भूमध्य रेखीय राकेट प्रक्षेपण केंद्र से (TERLS)
विश्व का पहला अंतरिक्षयान - स्पुतनिक 1 (04-10-1957 को रूस द्वारा प्रेक्षित)
अन्तरिक्ष में सबसे पहले जाने वाला जीवित प्राणी - लाइका नामक कुतिया. (स्पुतनिक 2 द्वारा 03.11.1957 को)
अंतरिक्ष में जाने वाला दुनिया का पहला पुरुष - रुसी नागरिक युरी गागरिन (वोस्तोक 1 द्वारा 12.04.1961 को पृथ्वी का एक चक्कर लगाया)
अंतरिक्ष में जाने वाला दुनिया का पहली महिला - रुसी नागरिक वेलेंताइना तेरिशकोवा (वोस्तोक 6 द्वारा 04.12.1963 को अन्तरिक्ष में गयी) (गागरिन के 2  साल बाद )
किसी दुसरे ग्रह पर उतरने वाला पहला मानव रचित यान - वेनेरा 3 (यह शुक्र ग्रह पर 16.11.1965 को उतरा)
चंद्रमा पर जाने वाला पहला द्वितीय इंसान - नील आर्मस्ट्रोंग एवं एडविन एल्ड्रिन (ये दोनों वैज्ञानिक नासा के यान अपोलो 11 के जरिये दिनांक 16.07.1969 को चाँद पर पहुंचे) (उसी वर्ष दो माह पूर्व भारत में इसरो की स्थापना हुई थी.) (जब रूस चाँद पर चला गया तब भारत ने इसरो की स्थापना की यानी १९६९ में. )
मंगल ग्रह पर पहली बार मानव रचित अन्तरिक्ष यान का उतरना - मार्स 2 (19.05.1971) (मेरे जन्म से ठीक 7 वर्ष पूर्व धरती का यान मंगल पर उतर चुका था.) (चाँद पर जाने के तीन साल बाद ही इंसान ने मंगल पर अपना यान उतार दिया)

भारत के अन्तरिक्ष केंद्र और उसकी इकाइयां

विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम (VSSC) - यह राकेट अनुसंधान और प्रक्षेपण यान विकास परियोजना बनाता है. अभी तक सभी भारतीय प्रक्षेपण यान (SLV-3, ASLV, PSLV, GSLV) को यहीं विकसित किया गया है.
इसरो उपग्रह केंद्र, बंगलौर (ISAC) - यहाँ उपग्रह परियोजना का डिजाइन, निर्माण, परिक्षण और प्रबंध कार्य होते हैं. स्थापना  - १९६९
अन्तरिक्ष उपयोग केंद्र, अहमदाबाद (SAC) - यहाँ प्रमुख कार्यों में दूर संचार, टीवी में सेटेलाईट का उपयोग मौसम विज्ञान, भू-मापन आदि कार्य होते हैं .
शार (SHAR), केंद्र, श्रीहरिकोटा - यहाँ सैटेलाईट का लौन्चिंग पैड है. यह आंध्रप्रदेश के नेल्लोर जिले में पूर्वी तट पर है. इसे सतीश धवन स्पेस सेंटर भी कहते हैं.
द्रव प्रणोदक प्रणाली केंद्र (LPSC) -  इसकी शाखाएं तिरुवनंतपुरम, बंगलोर, और महेंद्र्गिरी (तमिलनाडु) में हैं. यह संस्था रोकेट के इंजिन और उसके लिए इंधन को बनाने के लिए रिसर्च करने का काम करती है. महेंद्र्गिरी में इंजन को टेस्ट करने का भी सिस्टम मौजूद है.
इसरो टेलीमेट्री निगरानी एवं नियंत्रण नेटवर्क (ISTRAC) - इसका मुख्यालय बंगलौर में है और श्रीहरिकोटा, तिरुवनंतपुरम, बंगलोर, लखनऊ, पोर्ट ब्लेयर मारीशस में इसके भुकेंद्र हैं जहां से ये अन्तरिक्ष में मौजूद उपग्रह पर निगरानी रखते हैं और वहां से डाटा लेते हैं.
मुख्य नियंत्रण सुविधा, हासन (कर्नाटक) - यह उपग्रह के प्रक्षेपण के बाद सभी गतिविधि , उपग्रह को कक्षा में स्थापित करना केंद्र से उपग्रह को कांटेक्ट करना आदि काम करता है. इसरो का दुसरा मुख्यालय नियंत्रण सुविधा केंद्र भोपाल में स्थापित किया गया है , 2005 में.
इसरो जडत्व प्रणाली इकाई , तिरुवनंतपुरम - यह सैटलाइट और प्रक्षेपण यान के जडत्व प्रणाली पर काम करता है.  
भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला , अहमदाबाद (PRL) - अन्तरिक्ष और सम्बद्ध विज्ञान का अनुसंधान करता है.
राष्ट्रीय दूरसंवेदी एजेंसी , हैदराबाद  (NRSA) - यह उपग्रह से प्राप्त आंकड़े का अध्ययन करती है और इसका इस्तेमाल पृथ्वी के संसाधनों की पहचान, वर्गीकरण, और निगरानी करने की जिम्मेदारी करता है. इसका प्रमुख केंद्र बालानगर में हैं. एक और केंद्र देहरादून में भी भी है.
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प्रमुख भारतीय उपग्रह

स्वदेशी तकनीक से बना प्रथम भारतीय उपग्रह - आर्यभट्ट (इसे रूस के बैकानूर से दिनांक 19.04.1975 को प्रक्षेपित किया गया. अर्थ के निकट वृतीय कक्षा में 594 किलोमीटर की उंचाई पर रखा गया, वजन 360 किग्रा० था. इसे छः माह के लिए भेजा गया था लेकिन मार्च 1980 तक डाटा भेजता रहा. (इसरो की स्थापना के छः वर्ष बाद , यानी जिस वर्ष शोले फिल्म रिलीज हुई) 
आर्यभट्ट के बाद दसरी श्रृंखला - भास्कर श्रृंखला , इसके तहत भास्कर -1 और भास्कर 2 को रूस के द्वारा भेजे गए.
भास्कर के पश्चात दूसरी पीढ़ी के राकेट - रोहिणी श्रृंखला , इसके तहत भारतीय प्रक्षेपण केंद्र (श्रीहरिकोटा) से भारतीय प्रक्षेपण यान (SLV - 3) द्वारा चार उपग्रह छोड़े गए. रोहिणी आर एस 1 भारतीय भूमि से भारतीय स्वदेशी यान से प्रक्षेपित होने वाली पहली सैटलाइट थी जिसका प्रक्षेपण 18 जुलाई 1980 को श्रीहरिकोटा से किया गया था. (1980 में भारत ने पहली बार अपनी जमीन से कोई सैटेलाईट का प्रक्षेपण किया, उसी रोहिणी के नाम पर दिल्ली में रोहिणी सेक्टर बनाए गए.)
भारत का पहला संचार उपग्रह जिसे भू-स्थैतिक कक्षा में स्थापित किया गया - एप्पल , इसे 19 जून 1981 को ग्रेंच गुयाना के कोरु अन्तरिक्ष केंद्र से यूरोपीय अन्तरिक्ष एजेंसी के एरियन-4 से भू-स्थिर कक्षा में लगभग 36 हजार किलोमीटर की उंचाई पर स्थापित किया गया. GTO में भारत ने सबसे पहले एप्पल को भेजा. १९८१ में )
विस्तारित रोहिणी उपग्रह श्रृंखला - स्त्रास (SROSS) - इसके तहत 4 उपग्रह लांच किये गए.
भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (इनसैट) प्रणाली - यह बहुद्देशीय कार्यरत उपग्रह प्रणाली है. इसका उपयोग लम्बी दुरी के घरेलू दूरसंचार, दूरदर्शन प्रसारण, आकाशवाणी, मौसम सम्बन्धी जानकारी , भू सर्वक्षण, आदि है. अभी इसके चौथी पीढ़ी के उपग्रह का प्रक्षेपण हो चुका है.
भारतीय दूरसंवेदी उपग्रह प्रणाली (Indian Remote Sensing Satellite - IRS)  - इस श्रृंखला का इस्तेमाल राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंध प्रणाली की सहायता के लिए किया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों जैसे मृदा, जल, भू-जल, सागर, वन आदि का सर्वेक्षण और सतत निगरानी है. कार्टोसेट- 1 देश का पहला मैपिंग सैटलाइट है.      
भारत का पहला मौसम सम्बन्धी उपग्रह - मैटसेट (इसका प्रक्षेपण इसरो ने शार से  PSLV C-4 के द्वारा GTO (Geostationary Transfer Orbit) में किया गया, 12 सितम्बर 2002). इससे पहले भारत से सभी प्रक्षेपण सिर्फ ध्रुवीय कक्षा में ही किये गए थे. २००२ में भारत ने पहली बार GTO में अपनी धरती से मैटसेट को भेजा.
स्वदेशी GSLV की पहली उड़ान  - 20 सितम्बर 2004 को शार से दुनिया के सबसे पहले शिक्षा को समर्पित उपग्रह एजुसैट  को स्वदेशी GSLV F - 01 की सहायता से GTO में स्थापित किया गया. भारत में निर्मित स्वदेशी GSLV की यह पहली प्रायोगिक उड़ान थी. अब भारत खुद ही GTO में जाने वाले प्रक्षेपण यान बनाने उड़ाने में सक्षम हो गया. इसके पूर्व भारत सिर्फ पोलर सैटेलाईट लांच यान ही बना सकता था जो उपग्रह को ध्रुवीय कक्षा में ही पहंचा सकता था. GSLV F - 01 को साराभाई स्पेस सेण्टर तिरुवनंतपुरम में निर्मित किया गया था.  (२००४ में भारत ने पहली बार स्वदेशी GSLV से किसी सैटेलाईट को अपने जमीन से प्रक्षेपित किया)
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अन्तरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय - स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा (3 अप्रैल 1984 को रुसी रोकेट सोयुज टी -2 से स्पेस में गए, 8 दिन बाद 11 अप्रैल 1984 को वापस धरती पर गए.). इसके साथ ही अन्तरिक्ष में इंसान भेजने वाला भारत 14 वां राष्ट्र बना और राकेश शर्मा अन्तरिक्ष जाने वाले 139वें अन्तरिक्ष यात्री. 
अन्तरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय मूल की महिला - कल्पना चावला (इनकी मृत्यु 1 फ़रवरी 2003 को अन्तरिक्ष यान कोलंबिया के मिशन STS - 107 के वातवारण में पुनः प्रवेश के कुछ देर पश्चात नष्ट हो जाने से हुआ.
चंद्रयान 1 - यह भारत का चाँद के लिए पहला मिशन है जबकि दुनिया का 68वां मिशन था. इसका प्रक्षेपण स्वदेशी राकेट PSLV C11 के द्वारा शार से 22 अक्तूबर 2008 को किया गया था. चन्द्रमा के लिए विश्व का पहला यान रूस ने 2 जनवरी 1959 को ही भेजा, जबकि दुसरा यान अमेरिका ने 3 मार्च 1959 को भेजा था. इस तरह भारत को चंद्रमा तक जाने में अमेरिका से लगभग 49 साल अधिक लग गया.  अब तक चाँद पर राकेट भेजने वाले देश हैं रूस अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन , जापान. इस तरह से चाँद पर यान भेजने में भारत छठा देश बना. इस पर 11 पेलोड लगे हुए थे.
मंगलयान - पूर्ण रूप से भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा तैयार मंगलयान 24 सितम्बर 2014 को सुबह 8 बजे मंगल की कक्षा में प्रवेश कर गया. इसका प्रक्षेपण 5 नवम्बर 2013 को शार से PSLV C-25 के जरिये किया गया था. भारत एशिया का पहला देश है जिसने मंगल ग्रह पर अपना यान पहुंचाया.  इसके पूर्व USA की नासा , रूस की रॉस  और यूरोप की ESA ने ही मंगल ग्रह तक अपने यान पहुंचाए थे. मंगल मिशन की कुल लागत 450 करोड़ रूपये ही है.
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प्रक्षेपण यान प्रौद्यिगिकी
SLV 3 (Satellite Launch Vehicles, SLV-3) - ये सबसे पहला प्रक्षेपण यान था. जिसका निर्माण 18TH JULY 1980 को भारत में किया गया था. इसके साथ ही भारत अन्तरिक्ष क्लब में प्रवेश करने वाला छठा देश बन गया. यह 40 KG भार को ही निचले कक्षा में स्थापित कर सकता था.
ASLV (Augmented Satellite Launch Vehicle) - यह SLV3 का ही संवर्धित रूप था. यह 5 चरणों में प्रक्षेपित हो कर 100 से 150 KG तक का भार स्पेस के निचले हिस्से तक पहुंचाने में सक्षम था. हालांकि 1987 और 1988 में इसके दो पहले यान अपने टेस्ट में फेल हो चुके थे. जबकि आगे 2 यान सफल रहे थे.
PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) - इसका विकास 1200 Kg तक का भार तक वाले दूरसंवेदी उपग्रह को स्पेस के 900 किलोमीटर तक की उंचाई पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक /समकालिक कक्षा में स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया. यह चार चरणों वाला ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान है. जिसमे पहले और तीसरे चरण में ठोस प्रणोदक तथा दुसरे और चौथे चरण में द्रव प्रणोदक का इस्तेमाल किया जाता है. ठोस प्रणोदक में हाइड्रोक्सिल टर्मिनेटेड पॉली ब्युटाडाईन (HTPB) का इंधन के रूप में और अमोनिया परक्लोरेट का ऑक्सीकारक के रूप में प्रयोग होता है. जब कि लिक्विड फ्यूल के रूप में अनसिमेट्रिकल डाई मिथाइल हाइड्राजाईन (UDMH) & N2O4 का प्रयोग किया जाता है जो कमरे के ताप पर लिक्विड रहता है.
GSLV (Geo Stationary Or Geosynchronous Satellite Launch Vehicles) - यह तीन चरणों वाला भुतुल्यकालिक या भू-स्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान है. इसके प्रथम चरण में ठोस प्रणोदक और दुसरे चरण में द्रव प्रणोदक और तीसरे चरण में क्रायोजेनिक प्रणोदक का इस्तेमाल किया जाता है. ठोस इंधन में HTPB का और अमोनिया परक्लोरेट का ऑक्सीकारक के रूप में प्रयोग होता है. जबकि द्रव में UDMH & N2O4 का प्रयोग किया जाता है जो कमरे के ताप पर लिक्विड रहता है. क्रायोजेनिक तकनीक में द्रव हाइड्रोजन को अत्यंत निम्न ताप पर द्रव हाइड्रोजन (-250 ) और द्रव ऑक्सीजन (-183  का प्रयोग होता है. यह पहले परिक्षण में असफल रह गया था और GSAT -1 को 36,000 किलोमीटर की उंचाई पर स्थापित नहीं कर सका, 1000 किलोमीटर नीचे ही छोड़ दिया. जबकि दुसरे परिक्षण में जीसैट 2 को (वजन - 1800 Kg) को सफलतापूर्वक 360000 किलोमीटर की उंचाई पर पहुंचा दिया. इसका प्रक्षेपण 2003 के 8 मई को किया गया था शार से. इससे भारत उन 5 देशों (अमेरिका, यूरोप, युरोपिय्य संघ, जापान और चीन) के समकक्ष आ गया जो GTO में उपग्रह पहुंचाने वाला यान का निर्माण कर सकता है.   
क्रायोजेनिक प्रद्योगिकी - इसका अर्थ है निम्न्तापिकी . यह ग्रीक भाषा के क्रायोस से बना हुआ है जिसका अर्थ होता है बर्फ के समान शीतल. 00 से -1500 तक के ताप को क्रायोजेनिक तापमान कहा जाता है. क्रायोजेनिक ताप अवस्था वाले इंजन में अतिनिम्न ताप (-2500) पर हाइड्रोजन और -1830 पर ऑक्सीजन का इस्तेमाल होता है. क्रायोजेनिक इंजन में इन दोनों इंधनों को इतने निम्न ताप में रख कर द्रवित अवस्था में रखा जाता है. क्रायोजेनिक इंजन में इन तरल इंधनों से ठोस इंधन से अधिक ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है, इसका नियंत्रित रूप से इस्तेमाल किया जाता है. जबकि ठोस इंधन में ज्वलन दर को नियंत्रित करना मुश्किल होता है. इस टेक्नोलोजी वाली इंजन में प्रणोदक की प्रति इकाई भार में अधिक बल पैदा होता है जिससे यान को अधिक बल मिलता है. क्रायोजेनिक इंजन का पहली बार प्रयोग अमेरिका द्वारा एतलांस संतूर नामक राकेट में किया गया था. .
भारत में क्रायोजेनिक इंजन का टेस्ट सर्वप्रथम 28 अक्तूबर 2006 को तमिलनाडु के महेंद्र्गिरी के इसरो के संस्थान में प्रयोग किया गया था. इसका पहला इस्तेमाल 5 जनवरी 2014 को भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण हेतु GSLV D5 राकेट में किया.      
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भारतीय परमाणु अनुसन्धान
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डॉ. होमी जे भाभा की अध्यक्षता में 10 अगस्त 1948 को परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की गई. (आजादी के लगभग एक वर्ष बाद)
प्रधानमंत्री के अध्यक्षता में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों के कार्यान्वयन हेतु अगस्त 1954 में परमाणु ऊर्जा विभाग की स्थापना की गयी.
परमाणु अनसंधान एवं प्रमुख केंद्र -
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) - ट्राम्बे (मुंबई) - यह कनाडा के सहयोग से स्थापित किया गया है. इसमें साइरस नामक रिएक्टर स्थापित है जिसका उद्देश्य आइसोटोप का उत्पादन और उसके प्रयोग को प्रोत्साहित करना है.
बार्क के परमाणु रिएक्टर -
रिएक्टर
निर्माण वर्ष
क्षमता (मेगावाट में )
अप्सरा
1956
1
साइरस
1960
40
जरलीना
1961
00
पूर्णिमा - 1
1972
00
पूर्णिमा - 2
1984
00
पूर्णिमा - 3
1990
00
ध्रुव
1985
100
जरलीना और पूर्णिमा के तीन रिएक्टर जीरो क्षमता वाले रिएक्टर हैं जबकि शेष अप्सरा , साइरस और ध्रुव क्रमशः १, ४० और १०० मेगावाट वाले रिएक्टर हैं.
जीरो पॉवर रिएक्टर - प्रायोगिक रिएक्टर को जीरो पॉवर रिएक्टर भी कहते हैं क्योंकि इसका इस्तेमाल ऊर्जा प्राप्ति की अपेक्षा नाभिकीय अनुसंधान के लिए ख़ास तौर पर किया जाता है.
इंदिरा गाँधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) - इसकी स्थापना 1971 में कलपक्कम (तमिलनाडु) में की गयी. ये फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर के सम्बन्ध में अनुसंधान और विकास का कार्य करता है. यहाँ का फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर विश्व में अपनी तरह का पहला रिएक्टर है. जो प्लूटोनियम, युरेनियम मिश्रित कार्बाइड इंधन को काम में लाता है. इस केंद्र में कामिनी नामक रिएक्टर है. (कामिनी - कलपक्कम मिनी रिएक्टर) कामिनी 17 सितम्बर 1997 से काम करना शुरू किया है. यह इंधन के रूप में थोरियम - 31 का उपयोग करेगा, जबकि अन्य प्रायोगिक रिएक्टर में युरेनियम या प्लूटोनियम का उपयोग किया जाता है. कामिनी थोरियम का इस्तेमाल करने वाली विश्व की पहली रिएक्टर है.
इसकी अन्य विशेषता है - इसमें श्रृंखलागत अभिक्रियाओं को तीव्र न्यूट्रॉन के माध्यम से निरंतर जारी रखा जाता है. ताप रिएक्टर की अपेक्षा इसमें विखंडित न्युत्रों की संख्या अत्याधिक होती है. इसमें प्राकृतिक युरेनियम का प्रयोग 60 से 70 गुना अधिक होता है. इसमें रेडियोधर्मिता का उत्सर्जन अल्प मात्रा में होता है. इसमें शीतलक के रूप में सोडियम का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि सामन्य रियक्टर में जल का उपयोग होता है. फ़ास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर की रूपरेखा फ्रांस की रैपसोडी रिएक्टर पर आधारित है.
उच्च प्रद्योगिकी केंद्र (CAT) - 1984 में इंदौर में स्थापित उच्च प्रद्योगिकी केंद्र का मुख्य कार्य लेसर और त्वरकों के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का विकास करना है.
परिवर्तनीय ऊर्जा साक्लोट्रोंन केंद्र (VECC) - यह केंद्र परमाणु भौतिकी परमाणु रसायन शास्त्र , विभिन्न उद्योगों के लिए रेडियो समस्थानिकों के उत्पादन एवं को विभिन्न स्तरों से होने वाली क्षति के उच्च अध्धयन का राष्ट्रिय केंद्र है. इसका मुख्यालय कोलकोता में है.
परमाणु ऊर्जा विभाग के अन्य प्रमुख इकाइयां -
·         परमाणु पदार्थ निदेशालय - हैदराबाद
·         नाभिकीय इंधन परिसर - हैदराबाद
·         गुरु जल बोर्ड - मुंबई
·         भारतीय नाभिकीय ऊर्जा कारपोरेशन लिमिटेड (NPCIL) - मुंबई
·         भारतीय रेयर अर्थ लि० - मुंबई
·         विकिरण और आइसोटोप प्रद्योगिकी बोर्ड - मुंबई
·         भारतीय युरेनियम निगम लि० - जादूगोड़ा

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NPCIL की स्थापना - 1987 में हुई.
तारापुर परमाणु विद्युत उत्पादन केंद्र भारत का पहला परमाणु विद्युत् ऊर्जा केंद्र है जिसकी स्थापना अमेरिका के सहयोग से की गयी थी. इस उत्पादन केंद्र के लिए आखिर समय तक आवश्यक इंधन की आपूर्ति अमेरिका द्वारा की जाती रहेगी.
वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत् उत्पादन केंद्र रावतभाटा (राजस्थान) में है जिसकी स्थापना की शुरुआत कनाडा के सहयोग से शुरू की गयी थी, लेकिन बाद में यह परियोजना स्वदेशी तकनीक से पूरी की गयी.
भारत में परमाणु बिजली घर की लिस्ट -
1.    तारापुर परमाणु विद्युत गृह (महाराष्ट्र) - 1972
2.    राजस्थान परमाणु विद्युत गृह (रावतभाटा, राजस्थान), 1972
3.    मद्रास परमाणु विद्युत गृह (कलपक्कम , तमिलनाडु) , 1983
4.    नरोरा परमाणु विद्युत गृह, (बुलंदशहर, यूपी), 1991
5.    काकरापार परमाणु विद्युत गृह (सूरत, गुजरात) , 1993
6.    कैगा परमाणु विद्युत गृह (कर्नाटक) , 1999
7.    कुडनकुलम परमाणु विद्युत गृह, (कन्याकुमारी, तमिलनाडु) , 2000   
विश्व में सबसे पहला परमाणु विद्युत गृह का निर्माण रूस में किया गया था, दुसरा किया गया था अमेरिका में.
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भारत में परमाणु परीक्षण -
भारत में सबसे पहला परमाणु परीक्षण - 18 मई 1974 जैसलमेर के पोखरण में, क्षमता - 12 किलोटन. इसमें मात्र प्लुतोनिक इंधन का इस्तेमाल हुया था. (आर्यभट्ट के प्रक्षेपण से एक वर्ष पूर्व)
दुसरा परमाणु परीक्षण - 11 मई और 13 मई 1998 को पोखरण में ही किया गया था, जिसे शक्ति 98 का नाम दिया गया था. इस परीक्षण में वैज्ञानिक आर चिदम्बरम, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और अनिल काकोदार का विशेष योगदान था. इसमें परिशोषित युरेनियम से लेकर ट्रिटियम, ड्युटेरियम तक का इस्तेमाल किया गया था.
अमरीका ने पहला नाभिकीय विस्फोट जुलाई 1945 में वाइट सैंडस में किया गया था.
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भारतीय रक्षा प्रद्योगिकी
·         DRDO की स्थापना - 1958 (मुख्यालय - दिल्ली)
·         DRDO के प्रमुख एवं महानिदेशक वैज्ञानिक सलाहकार होते हैं - रक्षा मंत्री के.
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भारतीय मिसाइल प्रोग्राम -
इंदिरा गाँधी ने जुलाई 1983 में integrated Guided Missile Development Program - IGMDP) की नींव राखी. इसे DRDO के अधीन किया गया. इसने निम्न निसाइल बनाया -
पृथ्वी - जमीन से जमीन , कम दुरी का. पहला परिक्षण फरवरी , 1988 चांदीपुर में किया गया. इसकी न्यूनतम मारक क्षमता 40 Km और अधिकतम 250 Km है. (पृथ्वी मिसाइल पृथ्वी से उडती है और पृथ्वी पर ही गिरती है)
त्रिशूल - यह कम दुरी का जमीन से हवा में मारने वाला मिसाइल है. इसकी मारक क्षमता 500 मीटर से 9 किलोमीटर तक है. यह मैक - 2 की गति से निशाने को वेध सकता है. (त्रिशूल को शंकर भगवान जमीन पर से फेंक कर हवा में उड़ रहे विमान को मार गिराते हैं)
आकाश - यह जमीन से हवा में मार करने वाला मध्यम दुरी का बहुलाक्षीय मिसाइल है. इसकी मारक क्षमता 25 किलोमीटर है. यह परमाणु आयुध को धोने की क्षमता रखता है. और इसे मोबाइल लांचर से भी छोड़ा जा सकता है. इसके प्रणोदक में राज्मेट सिद्धांत का प्रयोग किया गया है. (यह मिसाइल जमीन से उड़ता है और आकाश में हमला कर देता है इसलिए इसका नाम आकाश मिसाइल है )
अग्नि - अग्नि श्रेणी में 5 मिसाइल है. अग्नि 1 से अग्नि 5 तक. यह जमीन से जमीन तक मार कर सकने वाली मिसाइल है जो परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम है. यह मध्यम दुरी की बैलिस्टिक मिसाइल है. अग्नि 3 की मारक क्षमता 3000 किलोमीटर तक है जिसे बढ़ा कर 5000 किलोमीटर तक किया जा सकता है. पनडुब्बी से छोड़े जा सकने वाले अग्नि 3 (SL) का भी विकास किया जा रहा है. 15 नवम्बर 2011 को ओडिशा के व्हीलर द्वीप से अग्नि 4 का परीक्षण किया गया. अग्नि 4 इंटरमीडिएट बैलिस्टिक मिसाइल है जो 3500 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है. 19 अप्रैल 2012 को अग्नि 5 का सफल परीक्षण किया गया, अग्नि 5 अंतरमहाद्वीप प्राक्षेपिक प्रक्षेपास्त्र (ICBM) है. अब तक सिर्फ 5 देश (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और यूके ) के पास ICBM मिसाइल थे. भारत छठा देश बन गया. ICBM मिसाइल उसे कहा जाता है जिसके मारक क्षमता 5500 Km. होती है, हालांकि अग्नि 5 की क्षमता अभी 500 किलोमीटर कम है. अग्नि 5 सैटेलाईट रोधी मिसाइल है. (अग्नि मिसाइल जमीन से उड़ता है और जमीन पर ही गिर कर अग्नि छोड़ता है)
नाग - यह टैंक रोधी निर्देशित मिसाइल है. इसकी मारक क्षमता 4 किलोमीटर है. इसका प्रथम सफल परीक्षण 1990 में किया गया. इसे दागो और भूल जाओ टैंक रोधी मिसाइल भी कहा जाता है.
धनुष - यह जमीन से जमीन पर मार करने वाला मिसाइल है. यह पृथ्वी मिसाइल का ही नौसैनिक रूपांतरण है. इसकी मारक क्षमता 150 किलोमीटर है और इसपर लगभग 500 किलो आयुध पक्षेपित किया जा सकता है. (यह जल से थल पर प्रहार करने वाला मिसाइल है.)
सागरिका - यह सबमेरीन लांच मिसाइल है. समुन्द्र से भीतर से इसका पहला सफल परीक्षण फ़रवरी 2008 में किया गया था. यह परम्परागत और परमाणु दोनों तरह के आयुध ले जाने में सक्षम है. पनडुब्बी से बैलेस्टिक मिसाइल दागने वाला भारत पांचवा देश है.
अस्त्र - यह मध्यम दुरी का हवा से हवा में मार करने वाल और स्वदेशी तकनीक से विकसित मिसाइल है. इसकी मारक क्षमता 10 से 25 किलोमीटर है. यह भारत का पहला हवा से हवा में मार करने वाल मिसाइल है. (अस्त्र पहला मिसाइल है जो फाइटर प्लेन में लगता है और दुश्मन के फाइटर प्लेन को मार गिराता है.)
ब्रहमोस - यह भारत और रूस की संयुक्त परियोजना के अंतर्गत बनने वाला सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है. यह सतह से सतह पर मार करने में सक्षम है. इसका नामाकरण भारत की ब्रहमपुत्र नदी और रूस के मास्कोवा नदी के मिश्रण से बना है. इसका प्रथम सफल परिक्षण जून 2001 में हुया था. इस क्रूज मिसाइल को भारत के सेना में वर्ष 2007 में शामिल किया गया था. इस क्रूज मिसाइल की मार्क क्षमता 290 किलोमीटर तक है और ये 200 किलो वजनी परमाणु बम ले जा सकता है. ये आवाज से तीन गुना तेजी से चलता है. यह भी दागो और भूल जाओ वाली मिसाइल है. (ब्रह्मपुत्र नदी जमीन से निकलती है जमीन में ही मिल जाती है.)
प्रद्युमन - यह मिसाइल दुश्मन के मिसाइल को बहुत ही हवा में ही बहुत कम दुरी पर मार गिराने में सक्षम है. यह एक इंटरसेप्टर मिसाइल है.
बैलेस्टिक मिसाइल - यह मिसाइल जमीन से ऊपर ले जाने के लिए प्रक्षेपित की जाती है लेकिन जमीन पर गिरने के लिए इसे गुरुत्वाकर्षण के भरोसे छोड़ दिया जाता है.
क्रूज मिसाइल - इस श्रेणी के मिसाइल अपने लक्ष्य को खोज कर उस पर प्रहार करते हैं.
युद्धक टैंक अर्जुन - इसका विकास DRDO ने किया है. इस टैंक की अधिकतम गति 70 किलोमीटर/ घंटा है. यह रात के अँधेरे में भी काम कर सकता है. इसमें एक फ़िल्टर है जिसका निर्माण BARC ने किया है.
T-90 S भीष्म टैंक - इसका निर्माण चेन्नई के निकट आवडी टैंक कारखाने में किया गया है. यह चार किलोमीटर तक मिसाइल दाग सकता है और दुश्मन के मिसाइल से खुद को बचा भी सकता है.
हल्के लड़ाकू विमान तेजस - यह स्वदेश निर्मित प्रथम हल्का लड़ाकू विमान है. इसका विकास HAL ने किया है. अभी इसमें अमरीकन कम्पनी GE का GE - 404 इंजन लगा हुआ है, जिसे स्वदेशी इंजन कावेरी से रिप्लेस किया जायेगा. यह दुनिया की सबसे हलकी विमान है जो 600 किलोमीटर/ घंटे की स्पीड से उड़ कर जमीन, जल और हवा में मार कर सकती है.
पायलट रहित प्रशिक्षण विमान निशांत - यह स्वदेशी निर्मित विमान है. इसे बिना पायलट के उड़ाया जा सकता है और 160 किलोमीटर तक के दायरे में रिमोट से कंट्रोल किया जा सकता है.
पायलट रहित विमान लक्ष्य - इसका विकास DRDO द्वारा किया गया है. इसे मिसाइल और तोपों के परिक्षण के दौरान लक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. यह 100 किलोमीटर तक के दायरे में रिमोट से उड़ता है.
एडवांस लाइट हेलिकोप्टर ध्रुव - DRDO द्वारा विकसित यह हेलीकाप्टर अधिकतम 245 किलोमीटर/घंटा के गति से उड़ सकता है. और ये चार घंटे तक का सफर कर एक बार में 800 किलोमीटर तक का सफर कर सकता है. इसमें दो चालकों सहित 14 व्यक्तियों को ले जा सकता है.
आई.एल. 78 - यह हवा में ही उड़ते हुए दुसरे विमानों में तेल भरने में सक्षम है. इसे भारत ने उज्बेकिस्तान से वर्ष 2003 में प्राप्त किया था. इसमें 35 टन इंधन को स्टोर रखने की क्षमता है, ये आगरा के एयरपोर्ट में रखा जाता है.
ड्रोन - ये छोटे से वायुयान होते हैं जिसका नियंत्रण रिमोट द्वारा जमीन से ही किया जाता है. शस्त्रों से सुसज्जित ड्रोन का इस्तेमाल पहली बार बाल्कन के युद्ध में किया गया था. लेकिन सबसे अधिक इस्तेमाल ईराक अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हुआ.

काली 500 - इसका विकास BARC द्वारा किया जा रहा है, यह एक शक्तिशाली बीम अस्त्र है जो कई गीगावाट शक्ति की माइक्रोवेब तरंगे उत्पन्न कर  है जो दुश्मन के मिसाइल या विमान के इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली या चिप को समाप्त कर उसे ध्वस्त करने में सक्षम होगी.
पिनाका - यह मल्टी बैरल राकेट लांचर है. यह DRDO द्वारा निर्मित है. इसे ARDE पुणे में बनाया जाता है. इसमें मात्र 40 सेकेण्ड में 100-100 Kg के 12 राकेट छोड़े जा सकते हैं जो कम से कम 7 और अधिक से अधिक 39 किलोमीटर तक की दुरी में दुश्मन के बंकरों को उड़ा सकते हैं.
स्टील्थ प्रद्योगिकी - स्टील्थ वायुयान और स्टील्थ जहाज का विकास स्टील्थ प्रविधि पर आधारित है. इस तकनीक के द्वारा वायुयान , जहाज पनडुब्बी, मिसाइल और उपग्रह को रडार, इन्फ्रारेड, सोनार की पहुँच से अदृश्य बना देता है. इस तकनीक का विकास जर्मनी ने सेकेण्ड वर्ल्ड वार के दौरान किया था. होर्टन हो 229 को प्रथम स्टील्थ एयरक्राफ्ट कहा जाता है.
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अन्य महत्वपूर्ण तथ्य -
·         वैज्ञानिक और आद्योगिक अनुसंधान परिषद् (CSIR) के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं. CSIR (Council of Scientific and Industrial Research) की स्थापना 1942 में हुई थी. इसका HQ दिल्ली में है.
·         विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केंद्र की स्थापना तिरुवनंतपुरम में 1963 में थुम्बा नामक गाँव में किया गया था क्योंकि यह केंद्र भू-चुम्बकीय विषुवत रेखा पर स्थित है.
·         पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है इसलिए कृत्रिम सैटेलाईट को पश्चिम से पूर्व की दिशा में प्रक्षेपित किया जाता है.
·         दुनिया की पहली परखनली शिशु को पैदा करने का श्रेय ब्रिटेन की लेसली ब्राउन को है जिसने 25 जुलाई 1978 को लुईस ब्राउन को जन्म दिया. भारत में प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी या तो दुर्गा (1978) है या हर्षा (1986).
·         स्कॉटलैंड के इयान विल्मुट ने 1996 में सर्वप्रथम एक वयस्क भेड़ से कोशिका ले कर डॉली नामक उसका क्लोन बना दिया था.
·         पहला बाइपास सर्जरी - 1953 में अमेरिका में
·         प्रथम हार्ट ट्रांसप्लांट - 1967 में अमरीका में डॉ क्रिस्चियन बर्नाड ने किया. 25 साल की डेनिस डारवेल का ह्रदय 53 साल की लेविस वान्सकी में लगा दिया.
·         साइबरनेटिक्स (Cybernatics) - विज्ञान का वह क्षेत्र जो मानव और यंत्र के बीच स्वचलन और संचार का अध्ययन करता है साइबरनेटिक्स कहलाता है. इसकी परिकल्पना 1949 में नारबर्ट वीनर ने की थी.
·         टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च की स्थपना - मुंबई में (19 दिसम्बर 1945 को ).
·         नेशनल स्कुल ऑफ़ डिजाइन कहाँ है? - पुणे में.
·         न्यूट्रॉन बम - इसकी विस्फोटक क्षमता तुलनातमक रूप से कम होती है लेकिन विकिरण क्षमता अधिक होती है. पृथ्वी और जल में रेडीयोधर्मिता फैला देती है और टैंक व बुलेट प्रूफ वाहन को तहस नहस कर सकता है.
·         साल्टेड बम - नाभिकीय हथियारो के अनुकूल पदार्थ को बाल्ट एवं सोने के द्वारा साल्टेड बम तैयार किया जात है. इसके द्वारा अधिक मात्रा में रेडियोधर्मी विकिरण पैदा किये जा सकते हैं.
·         माइक्रोवेब बम - इसका आविष्कार अमरीका द्वारा किया गया है. इस बम से इतनी तीव्र शक्ति की ऊर्जा का उत्सर्जन किया जाता है की शत्रु के इलेक्ट्रोनिक उपकरण व संचार प्रणाली ध्वस्त हो जाती है. इससे किसी प्रकार की जनहानि नहीं होती है.
·         वैक्यूम बम - अमेरिका की रक्षा अनुसंधान वैज्ञानिकों ने ऐसी थर्मोबेरिक प्रणाली का सफल परीक्षण किया है जिसके द्वारा रासायनिक और जैविकीय शस्त्रों का भंडार पर अति उच्च तापमान सृजित कर उन्हें बेकार किया जा सकेगा. इस प्रकार की शस्त्र प्रणाली को पहले वैक्यूम बम के नाम से जाना जाता था.
·         एडमिरल गोर्शोकोव एक विमान वाहक पोत है जिसे भारत ने रूस से खरीदा है. यह पोत विराट का स्थान ग्रहण करेगा.
·         आई.सी. चिप्स किसकी बनी होती है? - सिलिकान की. (इसका निर्माण JS किल्वि ने 1958 में किया)           
·         भारत का सबसे तेज कंप्यूटर - सागा 220 (इसरो द्वारा तैयार इस सुपर कंप्यूटर को 2 मई 2011 को विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केंद्र स्थित सुपर कम्प्यूटिंग लैब में स्थापित किया गया है.
·         कोरोनोग्राफ - अन्तरिक्ष में उठने वाली तूफानों की पूर्व जानकारी उपलब्द्ध कराने वाला उपकरण. इसकी सहायता से सूर्य के नौ बड़े तूफानों का पता लगाया जा सका है. जिन्हें कोरोनल मॉस इंजेक्शन कहा जाता है.
·         पालीग्राफ - झूठ पकड़ने की मशीन
·         फैक्स का पूरा नाम - फार अवे जेरोक्स (Far Away Xerox)
·         REWA - भारत की सर्वप्रथम बैटरी चालित कार
·         री - एजेंट - दूध में मिलावट का पता लगाने के लिए इस रसायन की एक बूंद डाली जाती है. इससे ढूढ के प्राकृतिक या सिंथेटिक होने का पता चल जाता है.
·         CD स्ट्रिप - सरसों तेल में येलो बटर की मिलावट का पता लगाने के काम आता है. यदि रसायन युक्त कागज पर तेल की बूंद डालने से गुलाबी हो जाय तो समझा जाय कि तेल में येलो बटर मिला हुआ है.
·         सार्स - (सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम) सार्स नामक यह बीमारी के विषाणु को पैरामिक्सोवायरस कहते है. निमोनिया की तरह बिमारी होती होती है.
·         नैवीरेपिन - एड्सग्रस्त महिलाओं के गर्भस्थ शिशु को एड्स से बचाने के लिए बच्चे को दी जाने वाली दवा. मात्र दो खुराक से ही शिशु को एड्स से बचाया जा सकता है. 18 माह तक दिया जाता है.
·         BT बीज - अमेरिकन कम्पनी मोनोसांटो ने कीटप्रतिरोधी क्षमता वाले कपास का बीज तैयार किया है. उसने वैसिलस थुरिजीएनसिस (BT) जीवाणुओं को कपास के बीज में अंतरित किया है. इसी प्रकार आलू , टमाटर और सरसों के कीट प्रतिरोधी बीज तैयार कर लिए गए हैं.
·         हाईब्रिडोमा तकनीक - डॉ मिलस्टोन कोस्लर और जर्मे द्वारा बनाए गए इस तकनीक से क्लोनी प्रतिरक्षियों का वाणिज्यिक उत्पादन किया जाता है.
·         टर्मिनेटर बीज - ऐसे बीज से फसल तो तैयार होते हैं लेकिन उनसे अंकुलक्षण बीज का उत्पादन नहीं होता है.
·         इकोमार्क - भारत में वैसे उत्पाद को दिए जाते हैं जो पर्यावरण के लिए अनुकूल होते हैं. यह वन मंत्रालय देता है.
·         टेस्ट ट्यूब बेबी - इस तकनीक का अविष्कार प्रो० सर रोबर्ट एड्सवर्ड्स (1925-2013) ने वर्ष 1968 में किया था. 1978 में ओल्डहैण्ड जनरल अस्पताल में लुईस ब्राउन नामक प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ. एड्सवर्ड्स को 2010 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला.

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